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हाथन हुसकि पिलाई फूलन पिलायो रम

हाथन हुसकि पिलाई फूलन पिलायो रम

नरेंद्र सिंह नेगी अपने गीतों से उत्तराखंड के  समाज का यथार्थ हमारे सामने रखते रहे हैं। समय समय पर उन्होंने उत्तराखंड की राजनीति पर भी करारे व्यंग्य कसे हैं। आज हम आपके सामने ऐसा ही एक गीत प्रस्तुत कर रहे हैं जिसमें चुनाव के समय बड़ी बड़ी राजनैतिक पार्टियों द्वारा मतदाताओं को लुभाने के लिये […]

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हिट भुला हाथ खुटा हला, खाण कमाणें छुईं कला

हिट भुला हाथ खुटा हला, खाण कमाणें छुईं कला

नरेन्द्र सिंह नेगी के गीतों की सबसे बड़ी खूबी यह है कि उनके गीत समाज को एक सार्थक सन्देश देते हैं। प्रस्तुत गीत भी युवा पीढी को आलस त्याग कर कर्मशील, मेहनती और आत्मनिर्भर बनने को प्रेरित करता है। आमतौर पर यह देखा गया है कि पहाड़ के पुरुष स्वरोजगार के प्रति आकर्षित नहीं होते। […]

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ना जा ना तौं भेळू पखाण, जिदेरी घसेरी बोल्यूं माण

ना जा ना तौं भेळू पखाण, जिदेरी घसेरी बोल्यूं माण

पिछ्ली बार की तरह एक बार फिर ऑडियो कैसेट “नयुं नयुं ब्यो च”  से नरेंद्र सिंह नेगी जी द्वारा गायिका अनुराधा निराला जी की साथ गाया एक गीत प्रस्तुत कर रहे हैं। यह गीत एक और जहाँ पहाड़ की संघर्षशील नारी की जीवटता को दर्शाता है वहीं  दूसरी और सरकार द्वारा बिना सोचे समझे नीतियाँ […]

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बिजी जा दी लाटी, बिजी जा दी लाटी……

बिजी जा दी लाटी, बिजी जा दी लाटी……

नरेन्द्र सिंह नेगी जी का यह भावपूर्ण गाना उनकी ऑडियो कैसेट “नयुं नयुं ब्यो च” में आया था बाद में इसी नाम से एक वीडियो एलबम भी निकली। एक नवविवाहिता अपने मायके आई है, अब उसके वापस ससुराल जाने का दिन आ पहुंचा है। नवविवाहिता अभी किशोरावस्था में ही है,  उसे पैदल ही ससुराल तक […]

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उत्तराखण्ड के राजकीय चिन्ह

बाय़ें और लगे चिन्ह को उत्तराखण्ड के राजकीय चिन्ह के रुप में अंगीकृत किया गया है। , जिसमें ऊपर के पहाड़ हिमालय की विराटता को प्रदर्शित करते हैं और इसमें दिखाई गई चार लहरें गंगा की लहरें हैं। जो उत्तराखण्ड के पहाड़ों से निकल कर मैदानों को सिंचित कर उत्तराखण्ड की उदारता और हृदय की विराटता को प्रदर्शित करती हैं।

कितना बदला है पहाड़ों का हाल?

कितना बदला है पहाड़ों का हाल?

21वीं शताब्दी में प्रवेश कर चुके भारत में आजादी के 57 साल बाद भी गरीबी हटाओ, भारत उदय, इण्डिया शाइनिंग जैसे दिवा स्वप्न के बीच आगे बढ़ रहे जनतंत्र में ग्रामीण भारत आज भी अपने मौलिक अधिकारों से कितना वंचित है यह हकीकत सामने रखते हैं नवोदित हिमालयी राज्य उत्तरांचल के अधिसंख्य दूरस्थ दुर्गम अंचल। 2187 मीटर की ऊँचाई पर बसे बागेश्वर जिले के समडर, बोरबलड़ा, भरणकाण्डे जैसे गाँव 21वीं सदी में भी आदम जीवन जीने को विवश हैं। समडर गाँव के हुकुम सिंह रुधो गले से अभी कुछ वर्ष पूर्व की एक घटना बयान करते हैं कि नन्दा देवी के मेले से लौटते हुए शम्भू नदी पर बनाये गये लट्ठे के पुल के टूट जाने से उनके गाँव की दो गर्भवती महिलाएँ तथा एक आठ वर्ष की बच्ची और वह स्वयं नदी में गिर गये थे। बच्ची को वह अपनी छाती में चिपकाये काफी दूर तक बहते चले गये और अन्ततः वह बच्ची उनके हाथ से छूट गयी और इस तरह तीनों कैसे काल का ग्रास बने। आधे से ज्यादा गाँव पूरी रात नदी की दूसरी तरु जंगल में बैठा रहा। साहब यह सब तो शम्भू नदी में आम बात है। हम कैसे अपने बच्चों को पढ़ायें, कैसे इतने दूर भेजें न जाने कब नदी चढ़ जाय, कब भालू हमला कर दे।

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