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उत्तराखंड से संबंधित समस्त जानकारी इंटरनैट पर लाने का संकल्प लिये एक अदना सा व्यक्ति। अपने फोरम और मेरा पहाड़ के साथ प्रयासरत।

3 responses to “घर घरुं आज है ग्ये चहा चूसा-चूस”

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    उत्तराखण्ड में पहले चाय पीने का प्रचलन नहीं था, मेरे पिताजी ने बताया कि ५०-६० के दशक में ही हमारे घरों में चाय आई और छा गई। इससे पहले कोई मेहमान घर पर आता था तो उसका स्वागत दूध-दही से होता था। अधिकांश पुरुष मेहमानों का स्वागत तम्बाकू पिलाकर किया जाता था। हर घर में तम्बाकू की चिलम अनिवार्यतः होती ही थी। जिस व्यक्ति के घर की चिलम हमेशा भरी हो और फरसी (जिसमें तम्बाकू रखी जाती है) बड़ी हो, उसे ही संपन्नता का प्रतीक माना जाता था। कहा भी जाता था कि "बाराबीसी को हर सिंह जिमदार खूब डबलन वाल छ हो, हर बखत फरसी भरि रूंछी" तम्बाकू बोई भी जाती थी और टनकपुर की मंडियों से खरीदी भी जाती थी। लेकिन जैसे ही चाय आई, इसने बैठको में हुक्के को बंद कर चाय की चूसा-चूसी बढ़ा दी।

    गोपाल दा का यह गाना शायद उस प्रथा के खत्म होने पर ही बना हो। अब तो चाय का इतना प्रभाव हो चुका है कि लोग कहते हैं कि "बहुते कणिया छन हो, चहा पिछा ले नै क्यो"

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    Hello sir,

    My Name if Kailash Arya from Rohtak – Haryana. I am kumauni and belongs to Basot – Bhikyasain – RamNagar Uttaranchal. All the singers are very excellent. Sir i want all songs sung by Late Sh. Gopal Babu Gosawami. Kindly provide the same. I will be thankful to you and your cooperative team. This site is very useful, please keep updating.

    Thanks

    With regards

    Kailash

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    Yes i agree with ghingaru. Chaha(Tea) reached in Uttarakhand Houses after 1930's. I think reason can be wide tea plantation enforced by britishers at that time in Kausani, Chaukori etc.

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