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	<title>Comments on: हुड़क्या बौल</title>
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	<description>Uttarakhand Encyclopedia</description>
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		<title>By: Gajender</title>
		<link>http://www.apnauttarakhand.com/hudkya-baul-traditional-songs-of-uttarakhand/#comment-169</link>
		<dc:creator>Gajender</dc:creator>
		<pubDate>Thu, 10 Sep 2009 10:58:04 +0000</pubDate>
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		<description>आपका प्रयास बहुत सराहनीय है। 
धन्यवाद - गजेन्द्र बिष्ट </description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>आपका प्रयास बहुत सराहनीय है।</p>
<p>धन्यवाद &#8211; गजेन्द्र बिष्ट</p>
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		<title>By: Anonymous</title>
		<link>http://www.apnauttarakhand.com/hudkya-baul-traditional-songs-of-uttarakhand/#comment-120</link>
		<dc:creator>Anonymous</dc:creator>
		<pubDate>Tue, 28 Jul 2009 11:17:21 +0000</pubDate>
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		<description>उत्तराखण्ड की लुप्त होती लोक संस्कृति की एक विधा है हुड़्क्या बौल, लेकिन उचित संरक्षण और संवर्द्धन के अभाव में, लोगों में आपसी तालमेल की कमी, अपने-अपने काम के लिये ग्रामवासियों के बजाय, अपने-अपने संसाधनों पर निर्भरता को ज्यादा तरजीह देने से यह कृषि लोक कला आज दम तोड़ती नजर आती है। अब तो कुशल हुड़का वादक भी बहुत कम मिलते हैं....उत्तराखण्ड की अधिकांश लोक कलायें अलिखित हैं और अधिकतर लोक कलायें जागर हो, हुडक्या बौल हो, चांचरी हो झोड़े हो या कोई भी कला हो सब अलिखित है और पीढी दर पीढी मौखिक रुप से विरासत में चली आ रही है। जिससे निश्चित तौर पर इसकी मौलिकता पर प्रभाव पड़ रहा है।  
      अब जब हमारा अलग राज्य बन गया है और अलग विभाग भी है तो संस्कृति विभाग को चाहिये कि इन सब चीजों का अभिलेखीकरण कर राज्य स्तर पर एक संग्रहालय में संग्रहीत करे। संस्कृति विभाग को इस ओर गंभीरता से सोचना चाहिये और इनके संरक्षण और संवर्धन के लिये प्रयास कर मूर्त रुप देना चाहिये। जब हम जैसे बेकार और अनपढ़ लोग इस बारे में सोच ले रहे हैं तो उत्तराखण्ड के प्रबुद्ध एवं विद्वान मंत्री, सचिव, विभागाध्यक्ष इस बारे में क्यों नहीं सोच पा रहे, यह यक्ष प्रश्न है। </description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>उत्तराखण्ड की लुप्त होती लोक संस्कृति की एक विधा है हुड़्क्या बौल, लेकिन उचित संरक्षण और संवर्द्धन के अभाव में, लोगों में आपसी तालमेल की कमी, अपने-अपने काम के लिये ग्रामवासियों के बजाय, अपने-अपने संसाधनों पर निर्भरता को ज्यादा तरजीह देने से यह कृषि लोक कला आज दम तोड़ती नजर आती है। अब तो कुशल हुड़का वादक भी बहुत कम मिलते हैं&#8230;.उत्तराखण्ड की अधिकांश लोक कलायें अलिखित हैं और अधिकतर लोक कलायें जागर हो, हुडक्या बौल हो, चांचरी हो झोड़े हो या कोई भी कला हो सब अलिखित है और पीढी दर पीढी मौखिक रुप से विरासत में चली आ रही है। जिससे निश्चित तौर पर इसकी मौलिकता पर प्रभाव पड़ रहा है। </p>
<p>      अब जब हमारा अलग राज्य बन गया है और अलग विभाग भी है तो संस्कृति विभाग को चाहिये कि इन सब चीजों का अभिलेखीकरण कर राज्य स्तर पर एक संग्रहालय में संग्रहीत करे। संस्कृति विभाग को इस ओर गंभीरता से सोचना चाहिये और इनके संरक्षण और संवर्धन के लिये प्रयास कर मूर्त रुप देना चाहिये। जब हम जैसे बेकार और अनपढ़ लोग इस बारे में सोच ले रहे हैं तो उत्तराखण्ड के प्रबुद्ध एवं विद्वान मंत्री, सचिव, विभागाध्यक्ष इस बारे में क्यों नहीं सोच पा रहे, यह यक्ष प्रश्न है।</p>
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