One response to “जाग जाग हे उत्तराखण्डि…..जै भारत जै उत्तराखण्ड”

  1. अधूरे और बिना पहाड़ को समझे ही विकास नीति जारी करने से उपजे उत्तराखण्ड में ९ साल बाद फिर वही ढाक के तीन पात हो रहा है। आज भी विकास की नीतियां मैदानी क्षेत्रों के हिसाब से बनाई जा रही है। नौलो, गधेरों, चालो-खालों की देख-रेख, जीर्णोद्धार?पुनर्निमाण के बजाय मार्का-२ हैण्ड पम्प लगाये जा रहे हैं। मास्टरों पर रजिस्टरों का भार लादा जा रहा है, सिंचाई के लिये प्रमपरागत गूलों, धारों के बजाय हाईड्रम/पम्पिंग थोपा जा रहा है। कृषि के लिये परमपरागत खेती के बजाय नये बीज देकर किसान की थाली और कमर दोनों तोड़ी जा रही है।

    ऐसे में यह लाइनें फिर से प्रासंगिक हो उठी हैं-अब जंग अपनी सरकार से अपने लोगों से होगी क्या?

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