रघुनन्दन सिंह टोलिया (Raghunandan Singh Tolia)
(माताः स्व. बिश्नी टोलिया, पिताः स्व. डी.एस. टोलिया)
जन्मतिथि : 15 नवम्बर 1947
जन्म स्थान : देहरादून
पैतृक गाँव : टोला, मुनस्यारी जिला : पिथौरागढ़
वैवाहिक स्थिति : विवाहित बच्चे : 2 पुत्रियाँ
शिक्षा : प्राइमरी से इण्टर तक- लखनऊ, रुड़की, मुरादाबाद
बी.एससी. इलाहाबाद विवि, एम.एससी. (गणित) डी.एस.बी. कालेज नैनीताल, एम.ए. (इतिहास) मुरादाबाद
डिप्लोमा इन रूरल डेवलपमेंट, रीडिंग यूनिवर्सिटी, यू.के.
पीएच.डी. (इतिहास),कुमाँऊ वि.वि।
जीवन का महत्वपूर्ण मोड़ः सन 1964 में आई.आई.टी. कानपुर में चयन के उपरान्त वहाँ तीन दिन प्रवास के बाद इंजीनियर बनने के स्थान पर सिविल सेवा में भाग्य अजमाने का निर्णय और बी.एससी. के द्वितीय वर्ष में पुनः इलाहाबाद विश्वविद्यालय वापसी। इंजीनियर बनाम सिविल सेवा कैरियर चुनने पर पिताश्री से परामर्श और उनकी यह राय कि ‘जीवन में जो भी करो उसे उत्साह व लगन से करो, कठोरतम परिश्रम से उत्कृष्ठता के उच्चतम स्तर को प्राप्त करो, व्यक्तिगत जीवन को पाक-साफ रखो और अपने मूल परिवेश को गौरवपूर्ण बनाओ, दूसरों के काम आओ’ यह मोड़ और उपदेश ‘चिर स्मरणीय’।
प्रमुख उपलब्धियां : 1. उत्तराखण्ड राज्य के गठन में कौशिक कमेटी रिपोर्ट को सफलता पूर्वक पूर्ण कर, भारत सरकार को प्रेषण।
2. सिविल सेवा में 1971 में प्रवेश करने पर यह निर्णय किया था कि उत्तराखण्ड व उत्तर प्रदेश के प्रशासनिक इतिहास में जो कुछ धुंधलापन है उसे साफ करने का प्रयास करूंगा। 1815 से 1858 तक काफी सीमा तक व्यवस्थित कर सका इसे। 1859 से 1884 तक अभी और व्यवस्थित करना है।
3. सेवा में आने के बाद उत्तराखण्ड के आर्थिक विकास में योगदान करने की सेवा पर्यन्त (32 वर्ष) कोशिश। आज यह दुग्ध विकास, चाय विकास, जड़ी-बूटी व सुगंध पौध के क्षेत्र में कुछ दिखाई भी पड़ता है। अग्रेतर जैविक कृषि, बांस व रिंगाल तथा रेशा को शेष सेवा काल व सेवानिवृत्ति के उपरान्त एक मिशन के रूप में लेने की इच्छा।
4. जन सहभागिता के क्षेत्र में थोड़ी बहुत सफलता।
युवाओं के नाम संदेशः 1. अपने राज्य के सर्वांगीण विकास व उसे पूरे भारत का अग्रणी व आदर्श राज्य बनाने के लिए ‘मैं क्या कर सकता हूँ’ की ओर ध्यान देना व अपने व्यक्तिगत/पारिवारिक योगदान के माध्यम से इस महान यज्ञ में सहायक होना।
2. आज हजारों परिवार तथा युवक युवतियाँ इस प्रकार की आर्थिक स्थिति में हैं कि वे अकेले या मिलकर बहुत कुछ कर सकते हैं। एक अच्छी कहावत याद आती है ‘गरीब से पूछो उसकी क्या परेशानी है; अमीर/सफल व्यक्ति से पूछो वह कितने घंटे कठोर मेहनत रोज करता है, जो उसकी सफलता का असली रहस्य है।’
3. जो भी युवक अच्छी आर्थिक स्थिति में है, जिन्हें रोटी रोजी की चिन्ता नहीं है (इनमें मैं स्वयं अपने व अपने पूरे परिवार को, दोनों बेटियों समेत, शामिल करता हूँ), उन्हें कोई न कोई ऐसा क्षेत्र निजी-मिशन के रूप में चुनना चाहिये तथा जीवन पर्यन्त उसकी सफलता को सचेष्ट होना चाहिए।
4. अपने मौलिक स्थान के प्रति अपने उत्तरदायित्वों को न भूलें। सेवा निवृत्त होकर या वानप्रस्थ में मूल स्थान को ही आबाद करें। उसे साधन सम्पन्न व खुशहाल बनाने के लिए निजी/पारिवारिक प्रयास करें। स्थानीयता व क्षेत्रीयता में भेद को स्मरण रखें। स्थानीयता एक गुण है, क्षेत्रीयतावाद एक दुर्गुण। स्थानीय, धर्म, लिंग व जाति के संकीर्ण दायरे से उठ गाँव, जिला, राज्य, देश के साथ क्रमोत्तर लगाव को पुष्ट करें। गरीब व असहाय के लिए जो सम्भव हो, अवश्य करें।
5. ऐसे खुशहाल/आर्थिक चिन्ता रहित हजारों परिवारों के युवक-युवतियों की सोच उत्तराखण्ड के विकास के लिये किस दिशा में सक्रिय होगी, यही इस राज्य के लिए आज निर्णायक बिन्दु है। सक्रिय व सकारात्मक युवा ही भविष्य के उत्तराखण्डी हैं। उन सभी पर विशेष अति विशेष उत्तरदायित्व है।
विशेषज्ञता : प्रशासन, प्राकृतिक संसाधन प्रबन्धन, ग्रामीण विकास, इतिहास।
नोट : यह जानकारी श्री चंदन डांगी जी द्वारा लिखित पुस्तक उत्तराखंड की प्रतिभायें (प्रथम संस्करण-2003) से ली गयी है.






