प्रोफेसर शेखर पाठक से साक्षात्कार

यह साक्षात्कार श्री चंदन डांगी जी ने अस्कोट-आराकोट अभियान-2004 के दौरान लिया था.

प्रश्न :-अस्कोट-आराकोट अभियान का मूल उद्देश्य क्या है ?
प्रो. शेखर पाठक :- अस्कोट-आराकोट अभियान का मूल उद्देश्य अपने गांवों को तुम जानो, अपने लोगों को पहचानो है। इसका उद्देश्य उस विचार को फैलाना भी है जो हम अपने क्षेत्र, इस देश और दुनियां के लिए सबसे उपयुक्त समझते हैं। यह हमारे 1984 में रचित गीत से भी प्रकट होता है। यह है जनता, जन संसाधनों और जनसंस्कृति की हिफाजत। इस हेतु समझ बढ़ाना और संघर्ष करना।

shekhar-pathak प्रश्न :- अभियान के बाबत आपने सबसे पहले कब जाना या सोचा ?
प्रो. शेखर पाठक :-
1971 से 1974 तक हम लोग अल्मोड़ा कॉलेज के छात्र थे। इसी तरह हमारे हमउम्र युवा नैनीताल, पिथौरागढ़, पौड़ी, श्रीनगर, टिहरी आदि में पढ़ रहे थे। हम अनेक लोग विश्वविद्यालय स्थापना के आन्दोलन के साथ थे। 1972 में पिथौरागढ़ में गोली चली थी और दो नौजवान गोली से मारे गये थे। अल्मोड़ा के छात्रों ने पिथौरागड़ से अल्मोड़ा जेल में लाये गये छात्रों को बिना शर्त छुड़ाया था। हम स्थानीय मामलों में भी दिलचस्पी लेते थे। जैसे पानी की दिक्कत, मूर्तियों की चोरी और फिर जंगल का प्रश्न। 1973 में अल्मोड़ा कॉलेज के 5 छात्र पिण्डारी ग्लेशियर होकर आये थे और पहली बार दानपुर इलाके में जाकर हमें पता चला कि जिन गांवों से हम आये हैं, उनसे बहुत पिछड़े और वंचित गांव हमारे यहां मौजूद हैं। इस यात्रा से लौटकर मैंने एक लेखमाला स्थानीय ‘शक्ति’ साप्ताहिक में लिखी। इसी समय श्री सुन्दरलाल बहुगुणा अपनी 120 दिन की यात्रा में उत्तराखण्ड में घूम रहे थे। कहीं उन्हें ‘शक्ति’ का वह अंक मिला, जिसमें मैंने अमेरिकी चिन्तक हर्बर्ट मारकूज की प्रसिद्व किताब ‘वन डाईमैन्सनल मैन’ को उदघृत करते हुए लिखा था कि “मनुष्य एक दिन तकनीक का इतना गुलाम हो जायेगा कि उसके पास शुद्व प्राकृतिक क्षेत्र बहुत कम रह जायेंगे”। यह बात बहुगुणा जी को हमारी ओर खींच लाई। वे हमारी खोज हमारे गांव गंगोलीहाट और पिथौरागढ़ में भी करते रहे। उन्हें बताया गया कि मैं जाड़ों की छुट्टियों में भी अल्मोड़ा में हूँ तो वे जनवरी 1974 में अल्मोड़ा आये। उन्होंने श्रीनगर और टिहरी से कुँवर प्रसून तथा प्रताप शिखर, जो कि उनके सम्पर्क में थे, को भी बुला लिया। इस तरह शमशेर व मेरी बहुगुणा जी, प्रसून तथा शिखर से मुलाकात हुई और गर्मियों की छुट्टियों में अस्कोट-आराकोट यात्रा करने का निर्णय हुआ। इस यात्रा में बहुगुणा जी, कुँवर प्रसून, प्रताप शिखर, विजय जरधरी, शमशेर बिष्ट, हरीश जोशी, राकेश मोहन, भुवनेश भट्ट,भुवन मानसून, राजीव नयन बहुगुणा सहित कुछ और छात्र / युवक शामिल हुए थे। फिर चिपको आन्दोलन के साथ यह क्रम 1975 के बाद निरन्तर चलता रहा, जिसमें दर्जनों छात्रों / युवाओें ने विभिन्न क्षेत्रों की यात्राएं कीं। हाँ, 10 साल बाद जब अस्कोट-आराकोट अभियान 1984 का आयोजन हुआ तो यह ‘पहाड़’ का आयोजन था और तमाम संस्थाएं तथा व्यक्ति इसमें हिस्सेदार थे। हम इसे और गहरी, और अधिक हिस्सेदारी वाली यात्रा बनाना चाहते थे। अत: हमने एक तो अस्कोट से पांगू तक का हिस्सा इसमें जोड़ा, दूसरा अस्कोट से आराकोट तक के मार्ग में भी कुछ अन्तरवर्ती क्षेत्र जोड़े। जैसे बदियाकोट से हिमनी, घेस, बलाण , बलाण से बेदिनी बुग्याल, वहां से वान, कनौल, सुतौल आदि होकर रामणी, रामणी से ढाक तपोवन या घुत्तु से कमद आदि। सर्वेक्षण हेतु फार्म तैयार किये गये और उस मार्ग, क्षेत्र या गांवों की उपलब्ध जानकारी यत्र-तत्र से जमा की ताकि उन्हें समझने का कोई संदर्भ बिन्दु हमारे पास हो। यह क्रम 1994 में भी बना रहा। हाँ, हिस्सेदारी बढ़ती गयी। इसके साथ ही मित्र संस्थाओं ने 1984 तथा 1994 में अनेक मार्गों में छोटी-छोटी यात्राएं कीं। जिससे अन्य अनेक क्षेत्रों की वास्तविकता भी सामने आयी। 2004 में यह क्रम और आगे बढ़ रहा है। जनवरी 2005 तक उत्तराखण्ड के विभिन्न क्षेत्रों में अनेक यात्राएं हो चुकी होंगी और इस क्रम की अन्तिम यात्रा जनवरी 2005 में कालसी (डाकपत्थर से बरमदेव) टनकपुर तक होगी।

प्रश्न :- सबसे पहली यात्रा के दौरान, आप 24 वर्षीय एक विद्यार्थी थे, तो आपके कैसा अनुभव प्राप्त हुआ था? आपने यात्रा से लौटने के बाद, अपने कैरियर तथा उत्तराखंड के भविष्य के बारे मैं क्या सोचा?
प्रो. शेखर पाठक :-
1974, 1984, 1994 या कि 2004 की यात्रा हर हिस्सेदार की तरह मुझे भी उत्तराखण्ड की ज्यादा गहरी समझ देती रही। इन यात्राओं ने हमें पहले पहाड़ों में रोका और फिर निरन्तर सक्रिय रहने का दबाब दिया। ये यात्राएं व्यक्तिगत यश हेतु न थीं पर इन्होंने हम सबको निश्चय ही योग्य और समझदार ही नहीं बनाया बल्कि संवेदनशीलता और रचनात्मकता भी हममें विकसित की। उत्तराखण्ड के बारे में हम सिर्फ किताबी बातें नहीं करते हैं।

प्रश्न :- आज आप एक विश्वविद्यालय के प्राध्यापक के रूप मैं अभियान का नेतृतव कर रहे थे. आपको कैसी अनुभूति होती है
प्रो. शेखर पाठक :-
2004 के अभियान का दरअसल मैं नेतृत्व नहीं कर रहा था। यह तो पहाड़ की टीम कर रही थी और तमाम सहयोगी कर रहे थे। इतना जरूर था कि मैं चारों यात्राओं में हिस्सेदार था और 84, 94 तथा 2004 में तो प्रारम्भ से अन्त तक रहा था। अत: यह तथ्य जरा सा अतिरिक्त संतोष देता था। लेकिन इस ‘मैं’ में ‘हम’ सभी मौजूद थे। 1974 में बहुगुणा जी साथ थे तो 1994 में चण्डीप्रसाद भट्ट जी और 2004 में 1974 के यात्री प्रसून तथा शमशेर का आना भी एक सुखद अनुभव था।

प्रश्न :- आप लगभग 50 दिन अपने विश्वविद्यालय से दूर रहे तो आपने अपनी कितनी छुट्टियां इस अभियान को समर्पित की? मेरा मतलब कि क्या विश्वविद्यालय ने इसे अध्ययन के उद्देश्य से ओफिसियल घोषित किया या फिर आपकी छुट्टियां लेनी पड़ी?
प्रो. शेखर पाठक :- 1984, 1994 तथा 2004 की यात्राएं मैंने पी.एल. (विशेषाधिकार अवकाश) लेकर की। सौभाग्य से इस अवधि में गर्मियों का अवकाश भी पड़ता है तो ज्यादा दिक्कत नहीं होती है। विश्वविद्यालय से कोई अध्ययन अवकाश इस हेतु नहीं लिया गया। सामान्यतया विश्वविद्यालय के डीन आदि ऐसी यात्राओं का महत्व नहीं समझ पाते हैं और अनेक तो अच्छी धनराशि वाले प्रोजेक्ट से आगे का सपना भी नहीं देखते हैं। इसीलिए हमारे विश्वविद्यालय उतने जीवित नहीं लगते जितना कि इनको सामान्यतया होना चाहिए था।

प्रश्न :- 30 वर्ष बाद, आपने बिना यात्रा-मार्ग बदले, निर्धारित समय-सीमा में 1,000 किलोमीटर से अधिक की यात्रा तय की, क्या यह थकाने वाली ना लगी ?
प्रो. शेखर पाठक :-
थकान तो होती ही थी। रोज 25-30 किमी. चलना। मंखदुवा (मांग कर खाने वाले) होने से भोजन व्यवस्था किंचित अव्यवस्थित होती थी। लेकिन जिस तरह आम लोगों तथा मित्रों ने अभियान में हिस्सेदारी की, उसमें हम थकान भूल गये। कुंवारी-पास पार करने के दिन हम पाणा से ढाक-तपोवन तक 38-39 किमी. चले। बीच में कोई बसासत नहीं है। अनेक दिन हमें 30-35 किमी. भी चलना पड़ा। डैन जैन्सन, नीरज पन्त तथा मैं आदि से अन्त तक अभियान में रहे। रूप सिंह धामी छोरी बगड़ (जिला पिथौरागढ़) की गोरी घाटी में स्थित गांव से अन्त तक रहे। रघुबीर चन्द तथा गिरिजा पाण्डे गोपेश्वर से नौगांव (उत्तरकाशी) तक छोड़ पूरी यात्रा में रहे। 15-20 साथी 20-25 दिन तक साथ रहे। बांकी 150 से ज्यादा साथियों पर ज्यादा दबाव नहीं था क्योंकि वे कुछ दिन या हफ्तों तक साथ रहे। इस यात्रा की थकान साथियों की मुस्कान नहीं घटाती थी, क्योंकि हरेक कुछ न कुछ सीख और जान रहा था। 30 से 45 दिन तक अभियान में रहने वालों का भार 5 से 10 किलो तक अवश्य घटा था पर गं%

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प्रबंधक

उत्तराखंड से संबंधित समस्त जानकारी इंटरनैट पर लाने का संकल्प लिये एक अदना सा व्यक्ति। अपने फोरम और मेरा पहाड़ के साथ प्रयासरत।

One response to “प्रोफेसर शेखर पाठक से साक्षात्कार”

  1. such attemts will certainly put us close, the scattered communty of hills.

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