11 responses to “अब कहां रहे वैसे श्यूं-बाघ”

  1. कुमायूनी किस्सागोई का बेहतरीन अंदाज़ | जैसे पढ़ते पढ़ते अपने बचपन और पहाड़ों की याद आ गई ठैरी | इन्तेजार है आगे के किस्सों का और अपना उत्तराखंड ने भी ग़ज़ब का काम किया ठैरा हम तक ये पहुचा कर के !

  2. श्यूं बाघ के विषय में अच्छी जानकारी दी..

  3. हमारे सोर की तरफ इसे कुकुरिया बाघ कहने वाले ठैरे, नान्छना बड़ा आतंक रहने वाला हुआ, हमारे भोटिया कुकुर पर चार बार अटैक किया ठैरा बाघ ने, लेकिन उसके गले में बाज्यू ने पट्टा लगवाया था, जिससे वह हर बार बच गया। सुबेरे दौड़ने जाने वाले हुये तो कई बार गाड़ से पानी पीकर लौटते हुये तो खुद भी देखा ठैरा, कई बार कितनी ही ठुलईजा, काकि को लुहुलुहान देखा-सुना भी, अब तो बाघ दिखा करके सुने भी भौत दिन हो गये हो……….आपके इस लेख को पढ़कर बचपने के वह दिन भी याद आये जब ईजा सुलाते समय डराती थी, “पड़ जा ईजा, हाऊ ऐ जाओ”…हम भी डरते थे, क्योंकि हमने उस हाऊ को देखा और कई बार सुना भी था……….अब क्या कहकर डराये?

  4. bahut badiya jankaari hai …..jai uttrakhand ….apna uttrakhand..

  5. देवेंद्रज्यू दिल जीत लिया आपने…वाकई कूमाऊंनी किस्सागोई का बेहतरीन उदाहरण…शैलेश मटियानी और शेखर जोशी वाली पांत में ही ठैरे हमारे लिए आप तो…

  6. विकास जी आपको श्यूं-बाघ भाये, मेरी कलम का उत्साह बढ़ा। मटियानी जी और शेखर जोशी जी जैसे वट वृक्षों की छांव में कलम चले, इससे बड़ा सौभाग्य और क्या हो सकता है। … वैसे सभी साथी मुझे देवेनदा कहते हैं। आप भी कहिए ना !

  7. निपुण जी अगले दो किस्से कैसे लगे? बचपन से मन में ये श्यूं-बाघ लेकर घूम रहा हूं, आप जैसे कथा रसिकों को वे अच्छे लग रहे हैं, इससे मेरी कलम और तेज चलेगी। इनमें से ज्यादातर बातें सच्ची हैं। अभी तो आप एक से एक और मजेदार किस्से पढ़ेंगे। पढ़ते रहिएगा….

  8. घिंघारू जी, अब तो श्यूं-बाघों की घटती संख्या देख कर डर लगता है! देखा होगा आपने भी विज्ञापन में वह नानु-नान बाघ का बच्चा, शिबौ-शिब…

  9. समीर लाल जी, आपकी इस बात ने मेरी कलम की ताकत बढ़ा दी। आभार।

  10. देवेनदा के किस्से पढने में बहुत आनन्द आ रहा है.. श्यू-बाघ के बाद अब किसी अन्य धारावाहिक का इन्तजार कर रहा हूँ..

  11. पहाड़ी भाई, मेरे कुछ और किस्से पढ़िए न ‘अपना उत्तराखंड’ और ‘मेरी कलम’ (http://dmewari.merapahad.in) में।

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