3 responses to “ओ पार के टिकराम और ए पार की पारभती”

  1. पारभती जैसी कितनी ही जीवट महिलाओं के किस्सों से भरा ठैरा उत्तराखण्ड। सलाम है उन सबके जज्बे को जो यह सब कुछ झेलने के बाद फिर से जंगल जाने की हिम्मत कर पाती थीं। अब तो दो कमरे के मकानों की साफ-सफाई में ही सैंणियों की कमर दर्द हो जा रही ठैरी… :D :D

  2. मेवाड़ी जी की कलम ने जंगल का वह रोमांच और पारभती की घबराहट जीवंत कर दी… कृपया आप लिखते रहें, हमें बहुत अच्छा लगता है.

  3. अहा! भौत ही आनंद आ गया हो महाराज्। मेवाडी जी को भौत-भौत धन्यबाद ठैरा ।

    हलिया

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