11 responses to “श्यूँ बाघ, देबुआ और प्यारा सेतुआ….”

  1. असली लगा हो महाराज्। पढ़्ते समय ऐसा लग रहा ठैरा जैसे बछपन मैं आमा-बुबु से किस्से सुनते समय लगता है हो। और तो और डर जैसा भी लग रहा ठैरा जैसे कि अभी श्युं बाघ आ जायेग। बाप रे!
    आपको बहुत बहुत धन्यबाद ठैरा फिर।
    आपका हलिया।

  2. bahut achi lagi gala bhar gaya setuwa ki tapkti aansuo se.

  3. मतलब आज रुलाने का मूड बनाकर आये ठैरे बल हैंऽऽऽऽऽऽऽ पहले उस ममतामयी फूल भैंस की ममता से रुलाया और अन्त में सेतुवा की मौत से। श्रृंखला का मार्मिक अन्त किया आपने।

  4. मेरा पहाड़ को पड़ कर तो आज सच मैं आज अपने पहाड़ की यद् आ गयी| इसमें संकलित कहानी खास तो पर सेतवा की कहानी ने तो रुला ही दिया | दूसरी तरफ ममता माये भैंस फूल ने तो| मुझे अपने गाँव की याद दिला दी मेरी भैंस की जोमेरे आने की आहट समझ कर हे रंभाने लगती थी | आपने तो आज सच मैं रुला दिया है |

    आपका अपना देवेन्द्र सिंह नेगी

  5. bahut acchi lagi hakikat se ru-b-ru karati hui

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  7. पुष्कर जी, धन्यवाद। हमारी ही कहानी हुई भाई, हकीकत ठहरी।

  8. श्यूं-बाघ का किस्सा पढ़ने के लिए आपको भी धन्यवाद हलिया भाई। कुछ और किस्से सुनाऊंगा।

  9. मेरी भी आंखें भर आती हैं सुंदर भाई, जब भी सेतुवा की याद आती है। उसके जोड़ीदार गुजारा की सुन कर भी आपका गला भर आएगा।

  10. आपने अभी हमारे गुजारा बैल की करूण कथा तो सुनी ही नहीं घिंघारू भाई…

  11. देवेंद्र जी, सेतुवा और फूल भैंस का दुःख मेरे साथ आपने भी बांट लिया। मेरा मन भी भर आया है भाई। लेकिन, गुजारा बैल की कहानी तो आपने अभी सुनी ही नहीं…

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