छबीलो गढ़वाल मेरो,रंगीलो कुमाँऊं…
उत्तराखंड की भूमि जहां एक और अपने सुन्दरता के लिये प्रसिद्ध है वहीं यह वीरों, क्रांतिकारियों की भूमि भी रही है। इन दोनों बातों को गोपाल बाबू गोस्वामी ने अपने एक बहुत ही प्रसिद्ध गाने में बखूबी रखा है। “छबीलो गढ़वाल मेरो, रंगीलो कुमाँऊं” आज एक ऐसा जुमला है पूरे उत्तराखंड के सौन्दर्य को दर्शाने [...]
घुघुति ना बासा,आमै की डाई मा
"घुघुती ना बासा" गोपाल बाबू गोस्वामी का एक दर्द भरा विरह गीत है, ठीक कैले बाजे मुरूली की तरह। इस गीत में भी उत्तराखंड की एक विरहणी युवती की विरह का वर्णन है। उत्तराखंड की अर्थव्यवस्था को मनीऑर्डर व्यवस्था भी कहा जाता है क्योकिं यहां की स्त्रियां परदेश गये हुए घर के पुरुषों द्वारा भेजे [...]
कैले बजै मुरूली… बैणा
“कैले बजै मुरुली…. बैंणा ऊंची ऊंची डान्यूँ मा” गोपाल बाबू गोस्वामी द्वारा गाया हुआ एक मार्मिक विरह गीत है। यह गीत एक ओर जहां एक विरहिणी की दशा का वर्णन करता है वहीं उत्तराखंड की उस स्थिति के बारे में भी बताता है जहां अधिकांश पुरुष सेना में काम करते हैं और उन्हें अपनी नयी-नवेली [...]
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