By श्री देवेन्द्र मेवाड़ी जी on October 15, 2009
अपनी बात दूसरों को समझाने के लिए हम क्या कुछ नहीं करते! बोलते हैं, आवाज देते हैं, मुख मुद्राएं बदलते हैं, शरीर की भाव-भंगिमाएं बनाते हैं, स्वागत करने के लिए गले लगाते हैं, हाथ मिलाते हैं, और विदा करने के लिए हाथ हिलाते हैं। यानी, येन-केन प्रकारेण अपनी बात दूसरों को समझा देते हैं। लेकिन, [...]
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By श्री देवेन्द्र मेवाड़ी जी on October 14, 2009
रविवार था। छुट्टी का दिन। बच्चों ने शाम को ही देवीदा से बात करके तय कर लिया था कि सुबह सैर पर निकलेंगे। गार्गी के घर पर मिलने की बात हो गई। देवीदा ठीक समय पर पहुंच गए। लेकिन, घर के सामने उदास बैठी गार्गी को देख कर चौंक गए। पूछा, “तुम तो सैर के [...]
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By श्री देवेन्द्र मेवाड़ी जी on October 6, 2009
पता है दोस्तो, एक समय ऐसा भी था जब धरती पर फूल नहीं थे! करोड़ों वर्ष पहले की बात है। धरती पर चारों ओर बड़े-बड़े दलदल फैले हुए थे। उनमें ऊंचे-ऊंचे मॉस और फर्न के पेड़ उगते थे। दलदलों में विशालकाय डायनोसॉर विचरते थे। फिर ऐसे पेड़ों का जन्म हुआ जिनमें काठ के फल और [...]
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By श्री देवेन्द्र मेवाड़ी जी on September 21, 2009
दोस्ती हो तो लाइकेन जैसी! हां दोस्तो, प्रकृति में लाइकेन अटूट दोस्ती का बेमिसाल नमूना है। इसमें दो दोस्त अटूट बंधन में बंध जाते हैं। दोस्ती का ऐसा बंधन जो जीते-जी टूट नहीं सकता। इस दोस्ती के कारण उनको पहचानना तक कठिन हो जाता है। इस दोस्ती में वे बिल्कुल नया रूप रख लेते हैं [...]
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